खूब बादल का बरसना प्यार है बरसात में,
रहमतों का इस तरह इज़हार है बरसात में 

बिजलियाँ सकते में हैं और अब्र भी हैरत में है,
लुत्फ़ पर वो ज़ुल्फ़ और रुखसार है बरसात में 

 यूँ तो पीने पर बहुत चर्चे हैं बज़्मे ज़ोहद में,
कौन काफ़िर है जिसे इनकार है बरसात में 

अर्श से आया ज़मीं में जज़्ब पानी हो गया,
आप को आने में हम तक आर है बरसात में 

अये खुशा दिल अब तो सैलाब-ए-मोहब्बत आएगा,
आज तो बाचश्मेनम दिलदार है बरसात में 

तार बारिश का न टूटे बज उठे तारे जुनूं
आफरीं दामान-ए-दिल भी तार है बरसात में 

दुसरे सब मौसमों में है रवैय्ये सर्द-ओ-गर्म,
उस के लब पर हाँ मगर इकरार है बरसात में 

अये 'सुहैल' उसको ज़रा खुल कर बरसना चाहिए 
एहतियाते हुस्न दिल पर बार है बरसात में 
___________________________________________सुहैल काकोरवी_____

रहमत- ईश्वरीय कृपा, इज़हार- प्रकट होना, लुत्फ़- आनंद, अब्र- बादल, रुखसार- गाल, ज़ुल्फ़- केश, बज़्मेज़ोहद- धार्मिक सभा,
अर्श- आकाश, जज़्ब-  सोखने की क्रिया, आर- झिझक, बाचश्मेनम- भीगी आँखों के साथ, आफरीं- स्वागत है, तार- फटा हुआ, सर्द- ठंडा, इकरार- स्वीकृति...
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