हमारी जीस्त बहुत बेक़रार गुज़री है,
कि तेरे वादे पे ऐ यारे-गार गुज़री है.
गुलों ने तोड़ दिए सब हिजाब आखिर-ए-शब्,
नसीम-ए-सुब्ह बहुत शर्मसार गुज़री है.
नज़र को कर गयी रौशन वजूद को ताबां,
वो एक शय जो बहुत ताबदार गुज़री है.
उस एक सोहबतें रंगीं का क्या बयान करें,
जो तेरे साथ मोहब्बत शेआर गुज़री है.
हमारी ख्वाहिशे दीदार उसकी चिलमन से,
हुई है शाद तो दीवानावार गुज़री है.
ज़माना ऐश का गुज़रा रवां हुए आंसू,
नज़र से हो के ग़मों कि कतार गुज़री है.
वो आये नींद पे काबू न रख सके अपनी,
शब्-ए-विसाल बहुत सौगवार गुज़री है.
वो तेरी खुशबु से महका गयी दिमाग मेरा,
हवा की मौज जो ऐ गुलअज़ार गुज़री है.
तुम्हारे साथ नयी ज़िन्दगी गुजारेंगे,
वो ज़िन्दगी कि जो थी मुस्ताआर गुज़री है.
ये क्या हुआ कि ये एहसास दिल से मिटने लगा,
"तुम आये हो न शब्-ए-इन्तिज़ार गुज़री है"
ये तेरी वादा खिलाफी तो हुस्न है लेकिन,
ज़माने भर को मगर नागवार गुजरी है.
हवा-ए-सर्द ने भी सर्द-सर्द आह भरी,
हमारे ज़ख्मों के जो आर-पार गुजरी है.
किसी का साथ था अंदेशा-ए-खिज़ां भी न था,
"सुहैल" अबकी बरस यूँ बहार गुज़री है.
______________________________सुहैल काकोरवी
जीस्त- ज़िन्दगी, यारेगार- निकटतम मित्र, हिजाब- परदे, नसीम-ए-सुब्ह- सुबह की हवा, शर्मसार- लज्जित, वजूद- अस्तित्व, ताबां- चमकदार, ताबदार- उज्जवल, मोहब्बत शेआर- प्रेममयी, रवां- बहना, कतार- पंक्ति, शब्-ए-विसाल- मिलन की रात, सौगवार- दुखी, गुल अज़ार- फूलों जैसा, मुस्ताआर - इज़हार, अंदेशा-ए-खिज़ां- पतझड़ का डर.

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