कैसे कहें कि दिल में कोई मेहमाँ न हो,
क्या लुत्फ़ ज़िन्दगी का जो आहो-फुगाँ न हो.
फिर शौक़-ए-दीद कौन सी मंजिल पे जायेगा,
"फैला हमारे सर पे अगर आसमां न हो."
आवाज़ के तिलिस्म से सब फूल खिल उठे,
गुलशन में ये कहीं मेरा जादू बयां न हो.
ईमां गिरफ्त में न कभी उसकी आयेगा,
आँखों में जिसकी सूरत-ए-हुस्न-ए-बुतां न हो.
काबू में तुझको देख के रहते कहाँ हैं हम,
इतनी सी बात पर मेरी तू बदगुमाँ न हो.
हम सब्र अपने क़त्ल पे करते हैं इसलिए,
डरते हैं सुन के सूरत-ए-कातिल धुआं न हो.
इरफ़ान-ए-रुए-सकिये महवश जो हो गया,
मेरी बला से हो कि मय-ए-उर्गावां न हो.
दिल खून उसका होता है उल्फत में हर घड़ी,
वो बदनसीब जिसका कोई राजदां न हो
मै उसको ढूँढने ने तो चला हूँ मगर 'सुहैल'
मुझको जहाँ का शक है वो दिलबर वहां न हो
________________________________सुहैल काकोरवी
आहो-फुगाँ - ठंडी सांसें और दर्द भरी आवाज़, शौक़-ए-दीद- देखने का शौक, तिलिस्म- जादू, गिरफ्त- पकड़, सूरत-ए-हुस्न-ए-बुतां - बुतों की सूरत, बदगुमाँ- भ्रम, इरफ़ान-ए-रुए-सकिये महवश - शराब पिलाने वाले के चेहरे को समझना, मय-ए-उर्गावां - लाल शराब

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