ूके रंगीन हुए जाते हैं रुखसार
हम काम इशारों से निकला नहीं करते 

दुनिया को खलिश है कि नहीं खुलता है कुछ राज़ 
सद्शुक्र कि मुझसे तो वो पर्दा नहीं करते 

वो हमको पिलाते हैं कोई उनको कहे कुछ 
हम मौसमे पुरकैफ में तरसा नहीं करते 

तुम कशिफे असरार हो तुम दिल का सहारा 
तुम जैसे किसी हाल में बदला नहीं करते 

 ये आज नए तर्ज़ में इज़हार हुआ है 
इस तरह मोहब्बत में वो तडपा नहीं करते   

मै उनको बुलाता हूँ ये है मेरा ताल्लुक 
ये उनका रवैय्या है वो आया नहीं करते 

ये नूर कि वादी है यहाँ होती नहीं रात 
जो लोग यहाँ रहते हैं सोया नहीं करते 


तुम दिल को बदल लेने में माहिर तो हो लेकिन 
ये काम है मुश्किल इसे तनहा नहीं करते 

वो ज़ुल्म तो करते हैं मगर अपने लबों से 
ज़ेबाइशे आराइशे तौबा नहीं करते 

ये हाल किसी ख़ास सबब से ही हुआ है 
इस तरह से वो नज़रे चुराया नहीं करते 

क्यों तुमने छिपा रखा है इदराक का सूरज 
बतलाओ कि क्यों शब् को सवेरा नहीं करते 

ये कौन सा अंदाज़ है अए इत्र के रसिया 
इस तरह से फूलों को निचोड़ा नहीं करते 

 जो मेरी तमन्नाये मोहब्बत की है मेराज 
वो मुझसे "सुहैल" ऐसी तमन्ना नहीं करते 

 ____________________________________सुहैल काकोरवी 
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