उसे  तहरीक  आने  की भला दी जाये  तो कैसे ,
रुंधी आवाज़ में उसको सदा दी जाये तो कैसे 

मै जब खुद ही बचाकर उसको रंजो ग़म से रखता हूँ,
तो उसके ज़ुल्म की उसको सजा दी जाये तो कैसे 

वो हर मुमकिन को नामुमकिन बना देने में माहिर है,
वो कहता है की आँखों से पिला दी जाये तो कैसे 

मिटाया मैंने अपने को यही है हासिल-ए-उल्फत,
किसी की याद भी दिल से मिटा दी जाये तो कैसे

है मसरुफे सुखन नासेह तो मै इस सोच में डूबा,
की उसकी बात चुटकी में उड़ा दी जाये तो कैसे 

वही तस्वीर जिससे ज़िन्दगी में रंग भरते हैं,
वही तस्वीर आँखों से हटा दी जाये तो कैसे 

वो हर दम बस इसी एक फ़िक्र से हैरान रहता है,
कि मेरे जज़्बाए दिल को हवा दी जाये तो कैसे 

‘सुहैल’ अब दिल में यादे यार का तूफ़ान बरपा है 
यहाँ उम्मीद की शम्मा जला दी जाये तो कैसे 

सुहैल काकोरवी *--*
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