वो किस्सा बहुत जाँफिज़ा लिख रहा है,
कलम बस सना-ए-खुदा लिख रहा है.
ये है कौन खुश्बख्त जिसके लिए वो,
ख़ुशी है हमें बेवफा लिख रहा है.
मुझे कबसे उलझन है क्या जाने क्यूँ कर,
वो कागज़ पे यूँ ही "जुदा" लिख रहा है.
जो ख़त उसका आया तो हम खिल उठे हैं,
वो हमसे बहुत है "खफा" लिख रहा है.
उसे तो मोहब्बत से ही दुश्मनी है,
गुनाहगार मुझको बजा लिख रहा है.
यूँ ही कम नहीं उलझने मेरे दिल की,
वो अपना पता भी नया लिख रहा है.
मुरत्तब हैं जिससे चमन की बहारें,
वो पैग़ाम रंगीं अदा लिख रहा है.
नहीं जिसमे कोई भलाई की सूरत,
वही हुक्म फ़रमाँरवा लिख रहा है.
जो पूछा था मैंने कहाँ तू बसा है,
जवाबन "दिलो जाँ में आ" लिख रहा है.
नहीं हमने हारी मोहब्बत की बाज़ी,
वो अपना कोई तजरबा लिख रहा है.
ये तहरीर उसकी निशात आफ़रीं है,
हर एक लफ्ज़ वो ग़मरुबा लिख रहा है.
"सुहैल" आज तहरीक भी सामने है,
कहानी हसीं आइना लिख रहा है.
___________________________सुहैल काकोरवी
जाँफिज़ा= आत्मिक सुख देने वाला, सना-ए-खुदा= इश्वर की महिमा, खुश्बख्त= अच्छे भाग्य वाला, बजा= उचित, मुरत्तब= संकलित, फ़रमाँरवा= आदेश पारित करने वाला, जवाबन= उत्तर में, तहरीक= प्रेरणा, रंगीं अदा= रंगीन अदाओं वाला, निशात आफ़रीं= ख़ुशी देने वाला, ग़मरुबा= ग़मों को ले जाने वाला

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