तेरी उल्फत ही मुझे ले जाएगी अब दार तक
जान मेरी मुन्तजिर है बस तेरे ही वार तक
शौके जांबाजी शऊरे इश्क की तकमील है
रास्ता ये जा रहा है मुझसे होकर यार तक
इस सफ़र में अज्म के पांव में सौ कांटे चुभे
देखने की जुस्तजू से राहते दीदार तक
गर्म किरने हंस पड़ीं मुझ पर गिरी दीवार भी
सौ जतन से जब मै पहुंचा साया-ए-दीवार तक
अपनी हस्ती के मआनी की वहां तफसील थी
और हमने कुछ न देखा आस्मां के पार तक
दिलरुबाई को समझना है तो बस नज्ज़ारा कर
देख उन होठों की जुम्बिश और उस रुखसार तक
सूरतें कितनी बदल कर इम्तिहाँ उसने लिए
तब कहीं पहुंचा मै मफहूमे उलिल अबसार तक
इसमें पिन्हा बर्क से जल जाएँ तो अच्छा रहे
हमको अच्छी लग रही है गर्मी-ए-गुफ्तार तक
सारे अफ्सानो का हासिल उसकी आँखें हैं सुहैल
हुस्न-ए-ख्वाबीदा से लेकर फितना-ए-बेदार तक
________Suhail Kakorvi_______
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दार- फांसी देने की जगह, जांबाजी- जान की बाज़ी लगाना, शऊरे इश्क- प्रेम की समझ, तकमील- पूर्णता, अज्म- इरादा, जुस्तजू- कोशिश, तफसील- विस्तार, जुम्बिश- कम्पन, रुखसार- गाल, मफहूमे उलिल अबसार- कुरान में समझदार लोगों को इसी शब्द से संबोधित किया गया है, पिन्हा- छिपा हुआ, बर्क- बिजली, गर्मी-ए-गुफ्तार- बातों की गर्मी, हुस्न-ए-ख्वाबीदा- सोता हुआ सौंदर्य, फितना-ए-बेदार- जागता हुआ आतंक..

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