शबाब झूम उठेगा शराब पीने से,
पियो न होगा कोई भी अज़ाब पीने से.
हमें तो हज़रत-ए-वाएज़ मिला है ऐसा सुरूर,
हमें न रोक सकेंगे जनाब पीने से.
मै इसपे आलम-ए-होश ओ खिरद निसार करूँ,
हक़ीक़तों में बदलते हैं ख्वाब पीने से.
तेरे जमाल की साकी बहार ऐसी थी,
संवर गया कोई खाना ख़राब पीने से.
हिजाब उठे तो सरशार हो गया वो भी,
वो पहले करता था थोड़ा हिजाब पीने से.
वो अब सिर्फ वफाओं की बात करता है,
ये आ गया है अजब इंक़लाब पीने से.
वजूद आग को पीने से हो गया आतश,
हमें हुई है नज़ारे की ताब पीने से.
तुम आईने में तो देखो करिश्माये साग़र,
तुम्हारा चेहरा हुआ है गुलाब पीने से.
'सुहैल' नाज़ उठता है जान-ए-मैखाना,
हुआ है हमपे करम, बेहिसाब पीने से.
'सुहैल' नाज़ उठता है जान-ए-मैखाना,
हुआ है हमपे करम बेहिसाब पीने से.
________________________सुहैल काकोरवी
वाएज़= प्रवचन देने वाले और शराब के खिलाफ बोलने वाले, आलम-ए-होश ओ खिरद= चेतना की मनोदशा, जमाल= हुस्न, खाना ख़राब= बर्बाद, हिजाब= लज्जा, सरशार= मस्त, वजूद= अस्तित्व, आतश= आग, ताब= बर्दाश्त, करिश्माये साग़र= शराब के प्याले का चमत्कार, करम= कृपा.
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मकते के दूसरे मिसरे में दो मानी हैं समझने वाले उसका लुत्फ़ लेंगे.

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