तू है वफ़ा का आइना जाने बहार दिलरुबा,
हुस्न तेरी अदा-अदा जाने बहार दिलरुबा.

सारे जहाँ को भूल जा जाने बहार दिलरुबा,
और मेरे करीब आ जाने बहार दिलरुबा.

मुझमे भी वैसा सोज़ हो मुझमे भी वैसा साज़ हो,
जैसा कि तू है खुश नावा जाने बहार दिलरुबा.

बस यही दिलरुबाई है बस यही मानिये बहार,
दिल न हमारा तू दुखा जाने बहार दिलरुबा.

तूने लबों की साख्त से सागरे मय बना दिया,
देर न कर पिला-पिला जाने बहार दिलरुबा.

तेरा तो खेल आग है तुझको शरार हैं पसंद,
मेरा जहाने दिल जला जाने बहार दिलरुबा.

बख्श दिल-ए-सुहैल को अपना मिज़ाज-ए-दिलबरी,
तू जो है उसको वो बना जाने बहार दिलरुबा.
___________________________सुहैल काकोरवी 

सोज़- जलन, साज़- संगीत, खुशनवा- अच्छी आवाज़ वाला, साख्त- बनावट, शरार- चिंगारी, बख्श- देना. 
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