जज़्बात पर रकम जो तेरी दास्ताँ न हो,
अल्फाज़ लब पे आयें मगर कुछ बयां न हो.
खूं है कि दिल में रंग है फसले बहार का,
देखें कहीं ये उसका रूखे गुल्फिशां न हो.
रहमत है उसकी अस्ल लगे लाख संग दिल,
मुमकिन कहाँ की यार मेरा महरबाँ न हो.
उस वक़्त तक बयां न करो मुद्दा-आ-ए-दिल,
जब तक के उसके दिल में मोहब्बत जवाँ न हो.
इम्काँ की मै तलाश में हूँ वो है साफ़गो,
मेहनत वो चाहता है मेरी रायगां न हो.
मौजों में जज्बे शौक़ की गरकाब वो हुआ,
वो चाहता था इश्क का दरिया रवाँ न हो.
समझेंगे उसको हो गया अब खुद पे कुछ यकीं,
जिस दिन के उसके दर में कोई पासबां न हो.
क्या लुत्फ़ कुर्बतों का वो कैसा निशाते वस्ल,
कुछ भी नहीं है गर कोई पैवस्त-ए-जाँ न हो.
सूरज से इश्क और तमाज़त से प्यार है,
अब दरमियाँ में अपने कोई साएबाँ न हो.
मकसद वो ज़िन्दगी का बताएगा क्या भला,
जो चाहता हो उसका कोई इम्तिहाँ न हो.
बाहें वो डालता है गले में मेरे 'सुहैल',
डरता हूँ इस यकीन में पिन्हाँ गुमाँ न हो.
____________________________सुहैल काकोरवी
रकम- लिखा होना, लब- होंठ, रूखे गुल्फिशां- फूल बिखराने वाला चेहरा, रहमत- दया, संग दिल- पत्थर दिल, मुद्दाए दिल- दिल का मतलब, इम्काँ- सम्भावना, साफ़गो- स्पष्ट वादी, रायगाँ- व्यर्थ होना, जज़्बे शौक़- प्रेम का उत्साह, गरकाब- डूबना, रवाँ- बहना, तमाज़त- तेज़ गर्मी, साएबाँ- छाया, मकसद- उद्देश्य, कुर्बत- समीपता, निशाते वस्ल- मिलन का हर्ष, पैवस्त- सम्माहित होना, पिन्हाँ- छिपा होना, गुमाँ- शक.

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