खुशामद करके वो पहरों कभी मुझको मनाता है,
उसे मेरी तरह से चाहने का ढंग आता है.

जहान-ए-हुस्न की रानाइयों में शौक़ का आलम,
शरारत जब भी दिल करता है दिलबर मुस्कुराता है 

बसत लुत्फ़-ओ-करम लेकर मुझे जाता है दरिया तक, 
डिबो कर मझको खुद भी उसी में डूब जाता है 

बवक्ते खास मुझको मुन्कशिफ करता है वो मुझ पर,  
वो अपनी शान-ए-यकताई का जलवा यूँ दिखता है.

लकीरें मेरे हाथों की यकायक जगमगाती हैं,
मेरे हाथों में जिस लम्हा तुम्हारा हाथ आता है.

'सुहैल' इस तरह लिखता है वो खुद आराई का किस्सा, 
वो अपना नाम लिख कर फिर तुम्हारा नाम लाता है.

 ______________________________________सुहैल काकोरवी 

 बवक्ते खास- विशेष समय,  मुन्कशिफ- प्रकट करना,  शान-ए-यकताई - एक होने की शान, खुद आराई -
अपने को सजाना.














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