पत्थरों से रोज़ टकराया हूँ मै
बेसबब ही आग से खेला हूँ मै
जिसके दामन में हैं नगमे इश्क के
ऐसा मानी खेज़ सन्नाटा हूँ मै
हार कर उसको न पछताना पड़े
बस यही तो उसको समजाता हूँ मैं
उसकी आँखों से समंदर बह गए
उसके लहजे में अगर बोला हूँ मैं
मुझमे ही कांटे तमन्नाओं के हैं
खुद ब खुद ज़ख़्मी हुआ जाता हूँ मैं
कोई क्या समझेगा मुझको अये सुहैल
ये बहुत है की खुद को जो समझा हूँ मैं
______________________________सुहैल काकोरवी

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