मिज़ाज-ए-जौफिशानी का खुनक आलम हुआ होता,
कहीं जो कतरा-ए-शबनम में सूरज ज़म हुआ होता.

ताल्लुक की कई परतें इसी सूरत से खुल जातीं,
ख़ुशी मुझको मिली थी इसका उसको ग़म हुआ होता.

सुकूं कुछ देर को मेरे जूनून-ए-दिल को मिल जाता,
वो अपनी जुल्फे बरहम से अगर बरहम हुआ होता.

सलीका वो सिखाता गर मुझे इज़हार-ए-उल्फत का,
सवाले शौक़ मेरा और भी मुबहम हुआ होता.

अगर जज्बों की सच्चाई पे आ जाता यकीं मुझको,
तबस्सुम उसका मेरे ज़ख्म का मरहम हुआ होता.

जहाँ बर्बाद और लोग अफ़साने सुनाते हैं,
बजाये गुफ्तगू इस हाल पर मातम हुआ होता.

तो मै अपना निज़ाम-ए-ज़िन्दगी तैयार कर लेता,
इरादा गर कोई भी उसका मुस्तहकम हुआ होता.

अगर हम मे भी कम होती हवस दीदार की लोगों,
तो फिर उसका भी शौक़-ए-खुद्नुमाई कम हुआ होता.

यही तो "मै" है जिससे फर्क सब फैले हैं दुनिया में,
बदल जाता ये सब मंज़र कि जो मंज़र में "हम" होता. 

'सुहैल' आता अगर वो कैफों-मस्ती ले के आँखों में,
तो साग़र मय का उन आँखों के आगे ख़म हुआ होता.

________________________सुहैल काकोरवी

मिज़ाज-ए-जौफिशानी- रौशनी बिखेरने का स्वाभाव, खुनक- नर्म, ठंडा,  कतरा-ए-शबनम- ओस की बूंदे, ज़म- अंतर्लीन, बरहम- बिखरा हुआ, परेशान,  इज़हार-ए-उल्फत- प्रेम स्पष्ट करना, सवाले शौक़- दिल की बात, मुबहम- संदिग्धार्थक, तबस्सुम- मुस्कान, गुफ्तगू- वार्तालाप, मातम- शोक प्रकट करना, मुस्तहकम- दृढ़, शौक़-ए-खुद्नुमाई - अपने सौंदर्य को दिखाने का शौक़,  कैफों-मस्ती- हर्ष उल्लास, साग़र- मदिरा का प्याला, ख़म- झुकना.
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