वो ढूंढ ले न शरारत नयी ये नामुमकिन 
करे न यार भला दिलबरी ये नामुमकिन 

सहारा चिहिए वो चाँद हो की सूरज हो 
खुद अपने तौर पे हो रौशनी ये नामुमकिन 

 वो अपनी प्यास से खुद इस कदर हिरासां है 
कि देख ले मेरी तशनालबी ये नामुमकिन 

तू अपनी शोख मिजाजी से कोई छेड़ न कर 
शिनाख्त पाए यहाँ सादगी ये नामुमकिन 

 समझता खुद भी तो है चश्मे इन्तिज़ार का दर्द 
कि यार छोड़ दे नाज़ुकरवी ये नामुमकिन 

तलब में जिसकी अना हो वही तो है महरूम 
तेरी अता में कहीं हो कमी ये नामुमकिन 

इसी से फूट निकलता है इत्तिफाक का रंग 
के इख्तिलाफ करेंगे सभी ये नामुमकिन 

सदा ये आती है लबहाय ज़ख्मे हिजराँ से 
सुहैल चैन न आये कभी ये नामुमकिन 
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हिरासां- मायूस, तशनालबी- प्यास, शिनाख्त- पहचान, चश्मे इन्तिज़ार- प्रतीक्षा करती आँखें, नाज़ुक रवी- धीरे चलना, अना- अहम्, महरूम- वंचित, अता- बख्शीश, लबहाय ज़ख्मे हिजराँ- जुदाई के ज़ख्मों के होंठ.. 

__________________सुहैल काकोरवी ___________
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