तुझमे सब अच्छा है बस एक इसी आदत के सिवा,
सूझता कुछ भी नही और शरारत के सिवा.

 नाज़ुकी उसके लबों की है बहुत खूब मगर,
हमको अब फिक्र नहीं दिल की नजाकत के सिवा. 

 अब वो गुज़रे हुए दिन लौट के आएंगे नहीं,
इस लिए करते हैं हम बात मोहब्बत के सिवा.

 कद्र बढती है अगर हो ये सिफत इन्सां में,
कोई जौहर नहीं दुनिया में शराफत के सिवा.

 बेक़रां हुस्न के रंगों का निराला जलवा,
हमने पाया ही नहीं आपकी सूरत के सिवा.

 आप चाहें कि बचें तल्ख़ हकायक से अगर,
आप जाएँ न कहीं हुस्न की जन्नत के सिवा. 

और कुछ होते हैं वो ये नहीं होते कि जो हैं,
हमने देखा है उन्हें वस्ल की रहत के सिवा.

उसका तस्लीम-ओ-रज़ा देख के हैरान हैं हम,
जिसने कुछ सोचा नहीं दीन कि दावत के सिवा.

और राहों में तो मंजिल का तसव्वुर ही नहीं,
फिर कोई जाये भला क्यों रहे उल्फत के सिवा.

ऐ मेरे चाँद दरीचे से ज़रा झांक तो ले,
तेरे कूचे में नहीं कुछ भी मुसीबत के सिवा.

तेरा दावा-ए-मोहब्बत तेरा ऐलान-ए-वफ़ा,
इसमें सब कुछ है मेरी जान हकीकत के सिवा. 

 घर से बाहर तो निकल ऐ शहे-कोताह खिराम,
हुस्न बिखरा है जहाँ में तेरी खिलवत के सिवा. 

उसने ये कहके मुझे टाल दिया हाय गज़ब,
"और भी गम है ज़माने में मोहब्बत के सिवा"

खौफ-ए-उक़बा भी है एहसास गुनाहों का भी है,
आसरा कोई नहीं है तेरी रहमत के सिवा.

हम रहे अपनी मोहब्बत से परेशान इधर,
उसको देखा ही नहीं शोखिये फितरत के सिवा. 

है वही कौल-ओ-अमल लाइके तहसीन 'सुहैल',
जिसमे कुछ और न हो हुस्न-ए-सदाक़त के सिवा. 
___________________________सुहैल काकोरवी

सिफत- गुण, जौहर- मोती, बेकराँ हुस्न- असीमित सौंदर्य, तल्ख़ हकायक- कडवी सच्चाइयाँ, वस्ल की राहत- मिलन का सुख, तस्लीम-ओ-रज़ा- इश्वर की मर्ज़ी के आगे सर झुकाना, दीन की दावत- दीन की तरफ बुलाना, तसव्वुर- कल्पना, रहे उल्फत- प्रेम का रास्ता, शहे-कोताह खिराम- छोटे पग रखने वाला हसीन, खिलवत- एकांत, खौफ-ए-उक़बा- आने वाले जीवन का डर, रहमत- कृपा, शोखिये फितरत- चंचल स्वभाव, कौल-ओ-अमल- कथनी और करनी, तहसीन- प्रशंसा, हुस्न-ए-सदाक़त- सच का सौंदर्य.
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