शोलों को तमन्नाओं के आँचल की हवा दी,
बेदर्द ने यूं दिल को तड़पने की सजा दी.
पर्दों में छिपे हुस्न की तस्वीर दिखा दी,
महफ़िल तेरे होठों ने तो गुलज़ार बना दी.
जब तर्क-ए-ताल्लुक को कहा मैंने तो हंस कर,
इक मेरी ग़ज़ल उसने मेरी धुन में सुना दी.
आईने से था रब्त उलझती गयीं जुल्फें,
आईने को दिल बन के धड़कने की अदा दी.
उस रुख पे हंसी आई चिटकने लगीं कलियाँ,
उस रुख ने चमनज़ार की तकदीर बना दी.
उन शोख़ निगाहों की शरारत अरे तौबा,
उन शोख़ निगाहों ने मेरी नींद उड़ा दी.
उलझा के मुझे उसने वाहमा-ए-ज़ात में उसने,
फिर खुद ही हकीकत की हर इक रIह दिखा दी.
बस मेरी नज़र तेरी नज़र और नहीं कुछ,
नज़रों ने तेरी बात ये दुनिया को बता दी.
उभरा वो हसीं चाँद वो खिलने लगे तारे,
ए रौनक-ए-मैखाना बड़ी देर लगा दी.
उठने लगी आँखें तुझे रानाई मुबारक,
मस्ताना अदाओं ने तेरी धूम मचा दी.
ये उसका है एहसान "सुहैल" उसका है एहसान,
दुनिया तेरी बेकैफ थी पुरकैफ बना दी.
______________________________________सुहैल काकोरवी
गुलज़ार= बाग़, तर्क-ए-ताल्लुक= सम्बन्ध तोडना, रब्त= हार्दिक संपर्क, रुख= मुखमंडल, चमनज़ार= बाग़, वाहमा-ए-ज़ात= स्वयं के संदेह, हकीकत= वास्तविकता, रौनक-ए-मैखाना= मधुशाला का सौंदर्य, रानाई= सौंदर्य, बेकैफ= नीरस, पुरकैफ= आनंदमयी.

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