नज़र की ज़ुल्फ़ की रंगी अदा की,
करो बातें बस उस जाने हया की...

 यही फैज़ान है कुदरत का उस पर,
"बिगड़ने पर भी ज़ुल्फ़ उसकी बना की"

करे है रोज़ हंस कर वादा-ए-वस्ल,
कसम खाता है वो काफिर खुदा की...

तुम्हारे नूर से चमका है बेशक,
ये पैकर जो मिला था हमको खाकी...

मुझे दर्द-ए-मोहब्बत में है राहत,
इनायत है ये उस दर्द आशना की...

मेरे दिल को किया रुसवा-ए-आलम,
ये दिलदारी तो उसने बारहा की...

किसी इक पर वो टिकता ही नहीं है,
मुसीबत है जफा की और वफ़ा की...

"सुहैल" अहले जफा से हो न पुर्सिश,
दुआ जब की तो हमने ये दुआ की...
________________________सुहैल काकोरवी 

फैज़ान= कृपा, वादा-ए-वस्ल= मिलन का वादा, पैकर= शरीर, खाकी= मिटटी का, दर्द आशना= दर्द जानने वाला, रुसवा-ए-आलम= संसार में बदनाम करने वाला,  बारहा= बहुधा, जफा= कुरूरता, पुर्सिश= पूछ-ताछ...
0 Responses

Post a Comment