इतना है याद कि थी फितना-ए-बेदार अदा,
एक थी एक मेरे दिल की तलबगार अदा.
उसके पैकर में फ़रोज़ां हैं हया के शोले,
अब ग़ज़ब ढायेगी हर एक शररबार अदा.
तीरे गम्ज़ा जो चढ़ा खिल उठी अबरू की कमां,
कत्ले आलम के लिए हो गयी तैयार अदा.
इसकी तफसील की फुर्सत नहीं ए जज़्बा-ए-शौक़,
रास्ता कर गयी जज़्बात का हमवार अदा.
लाख तू मुझसे खफा होने का इज़हार करे,
मै तो कहता ही रहूँगा इसे सौ बार अदा.
ये भी इक हाल है जब टीस में आता है मज़ा,
ज़ख्मे दिल चाहते हैं कोई नमकदार अदा.
इम्तिहां दिल का बहुत देर तलक होता रहा,
मेरी आगोश में थी हासिल-ए-दीदार अदा.
जिससे तू राज़ी हो और जिससे हो तस्दीक-ए-वफ़ा,
ऐसा सजदा मै करूँ मालिक-ओ-मुख़्तार अदा.
वो कभी होता है खुश मुझसे कभी मुझसे खफा,
फूल होती है कभी और कभी खार अदा.
इससे कुछ सोच में पड़ जाते हैं माशूक सिफत,
हक़ मोहब्बत का जो करते हैं वफादार अदा.
रुख पे सूरज के है वो तेरी तजल्ली रक्सां,
चाँद को हम तो समझते हैं चमकदार अदा.
इसको ही कहते हैं हंगामा-ए-महशर शायद,
अपने ही हुस्न से जब होती है सरशार अदा.
आफियत इश्क में उन लोगों को मिलती है 'सुहैल',
जो समझते हैं के उस लब पे है इन्कार अदा.
______________________________सुहैल काकोरवी
फितना-ए-बेदार- जगता हुआ आतंक, तलबगार- मांगने वाला, पैकर- शारीरिक गठन, फ़रोज़ां- प्रज्ज्वलित, हया- लज्जा, शररबार- चिंगारियां बरसाने वाला, तफसील- विस्तार, जज़्बा-ए-शौक़- प्रेम की जिज्ञासा, हमवार- समतल करना, तीरे गम्ज़ा- शरारत भरी नज़र, पलकें, अबरू- भवें, इज़हार- स्पष्ट करना, आगोश- आलिंगन, हासिल-ए-दीदार- देखने का निष्कर्ष, तस्दीक-ए-वफ़ा- वफ़ा का प्रमाण, मालिक-ओ-मुख़्तार- मालिक और अधिकार संपन्न (ईश्वर), खार- कांटा, माशूक सिफत- प्रेयसी जैसी विशेषताएं, रुख- मुखमंडल, तजल्ली- दिव्य प्रकाश, रक्सां- नृत्य मुद्रा, आफियत- सुरक्षा, लब- होंठ, नमकदार- नमक रखने वाला. हंगामा-ए-महशर- प्रलय का शोर, सरशार- मस्त होना.

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