जब भी वो बेनकाब होता है,
सारा आलम शराब होता है.

है इसी में जवाब-ए-जज़्बा-ए-शौक़,
आज वो लाजवाब होता है.

रात का दिल धड़कने लगता है,
जब जवां माहताब होता है.

अपने जलवों से बेखबर है कोई,
नूर खुद ही हिजाब होता है.

दिल-ए-महशर पे बर्क गिरती है,
मेरा उनका हिसाब होता है.

वो जो आता है सैर-ए-गुल के लिए,
क्या चमन पर शबाब होता है.

 आरज़ू रस्ते बनती है,
हर हकीकत में ख्वाब होता है.

चाहने की तो बात क्या उसको,
देखना भी सवाब होता है.

मुझको है फिक्र किसके पहलू में,
रात भर आफ़ताब होता है. 

आइना पेशे हुस्न-ए-जानाना,
शर्म से आब-आब होता है. 

हम कहाँ ग़म से हारते हैं 'सुहैल',
वो कहाँ कामयाब होता है.
______________________सुहैल काकोरवी 

माहताब- चाँद, हिजाब- पर्दा, बर्क- बिजली, महशर- प्रलय, आफ़ताब- सूरज, पेशे हुस्न-ए-जानाना- प्रेयसी के सौंदर्य के सामने, आब-आब- लज्जा से पसीने-पसीने हो जाना.
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